पिछले लेख के नैरेटिव को कन्क्लूसिव आयाम देते हुए मैं आपका ध्यानाकर्षण इस ओर चाहूँगा कि पुरुष की स्ट्रैटिफाइड पैट्रिआर्कल सोच स्त्रीविशेष के विचार के स्तर पर हिंसा करते हैं और उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं।

इस तरह से वो हीनता का भाव उत्पन्न कर पाने में सफल होता है जो उसेवर्थलैसमहसूस करने पर विवश कर चूका होता है। स्त्री अपनी पहचान खो चुकी होती है। इस मानसिक प्रताड़ना की चोट बेहद गंभीर होता है और आप दर्द का अंदाजा भी नहीं लगा सकते क्योकिं वह नज़र नहीं आता पर सबसे घातक होता है। शरीर पर निशान छोड़ने वाले इस घाव सेधीमी मौतहोती है जिसमे संवादहीनता, उपेक्षा, उलाहने, तिरस्कार, और व्यंग्यवाण  होते है। आकारहीन हथियार मन पर गहरे घाव करते हैं।

इस तमाम मसले में पितृसत्तात्मक मानसिकता एक अहम रोल निभाती है। क्योकिं यह पितृसत्तात्मक समाज की परवरिश में पलेबढ़े पुरुष के लिए स्वीकार करना नामुमकिन होता है कि स्त्री भी समानता का हक़ रखती हैं। वह स्त्री उतना ही दुरुस्त है जितना की वह स्वयं। और मानसिक हिंसा कर के वह स्त्री में खुद के प्रति विश्वास को जानलेवा नुकसान पहुंचता हैं, उसके अस्तित्व पर कुठाराघात करता हैं। फलतः वह इस प्रक्रिया में उसे उसके पति से इतरवर्थलेससाबित कर उसके स्वयं के अस्तित्व को समाप्त कर उसेदोयम दर्जेका साबित कर चूका होता हैं।

विडंबना यह है कि यह सब कुछ हमारें सभ्य समाज के आवरण तले वे लोग ही करते हैं जो समाज में प्रमुख स्थान पर होते हैं। इसलिए इस प्रकार के स्ट्रक्चरल हिंसा पर बात नहीं की जाती हैं। यह धीमा आँच नहीं तो क्या है जिसमे एक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति स्त्री के ऊपर मौनहिंसा कर त्रासजन्य आनंद की अनुभूति कर रहा होता हैं और उसे धीमेधीमे मार रहा होता हैं।

वही नैरेटिव का दूसरा आयाम जिसकी सापेक्षता मैंने विस्फ़ोट के मानिंद सघन हैजो सबको दिखाई नहीं तो सुनाई जरूर दे जाती हैं, पितृसत्तात्मक समाज की सबसे कुरूप, वीभत्स घृणित आत्यंतिक स्वरुप है। पितृसत्तात्मक मानसिकता का नंगा नाँच जब जबरन कुछ लोग किसी निरीह असहाय लड़की को अकेले में पाकर उसपर अपनी मर्दांनगी साबित करते हैं। उसकी अस्मत लूटते हैं, अज़मत से खिलवाड़ करते हैं। हालिया घटना जिन्द का रेप, घिनौनी मानसिकता का वह रुग्ण रूप जब कुछ लोग अपनी ना सिर्फ उस बच्ची के प्राइवेट पार्ट्स को सिर्फ क्षतविक्षत करते हैं बल्कि रॉड घुसाकर उसके इंटेस्टाइन तक को नुकसान पहुँचाते हैं।

ये असामाजिक तत्व, नाक़ाबिलेबर्दाश्त कुकर्मी सभ्य समाज में कतई भी रहने योग्य नहीं है। इनकी मानसिकता के अनुसार स्त्री स्वतंत्रता के साथ जी नहीं सकती है, वह स्वछन्दता से कही घूमफिर नहीं सकती, अपने मनमुताबिक़ कपड़े नहीं पहन सकती, सबसे बड़ी बात वो सिर्फ एक इंसान नहीं हो सकती है मतलब वो बराबरी का अपना संवैधानिक हक़ नहीं आज़मा सकती हैंउसे हमेशा एकदोयम दर्जे का नागरिकही रहनी चाहिए।

दोनों ही परिस्थितियों में पुरुष महिला के ऊपर अपनी पैट्रिआर्कल एजेंसी की ज़ोरोआज़माईश कर रहा होता हैं। वो उसपर अपनी अथॉरिटी पुख़्ता कर रहा होता हैं। वह उसके शरीर, मन, और बौद्धिकता पर कुठाराघात कर के उसे झूकने पर मज़बूर कर रहा होता हैं। वह यह कह रहा होता हैं कि हर स्थिति में तुम्हारा अस्तित्व पुरुष के सापेक्ष ही होगातुम किसी भी तरह से स्वतंत्र आचरण नहीं कर सकती। तुम्हें किसी की पत्नी, माँ, बहन ही होना होगा इसके इतर कुछ भी और गैरस्वीकार्य है। फिर भी तुम्हारी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होगी। किसी भी स्वरुप में अगर तुम रेखाएँ लांघती हो तो तुम पर हर संभव, हर यत्न से अत्याचार होंगे जिनको पितृसत्तात्मक समाज बड़े सहजता से स्पॉनसर और लेजिटिमेट ठहरा रहा होता हैं। क्रूर हिंसा चाहें वो फिजिकल हो या मेन्टल सभी निंदनीय और घृणित हैं। इन पर बात होनी चाहिए और हमें देखना चाहिए की हम कहाँ ठहरते हैं किस ओर जा रहे हैं।

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