धीमी आँच का जलना क्या होता है ? और, एक विस्फ़ोट की आवृत्ति क्या होती है ? ख़ैर, आपकी सहूलियत के लिए मैं एक सामानांतर रेखा खींचने का प्रयास करता हूँ। दोनों ही परिस्थितयों में एक समानता है – त्रासजन्य आनंद (सैडिस्टिक प्लेजर), जी हाँ दोनों ही मामलों में त्रासजन्य आनंद की मनोवृत्ति का उपस्थित होना।

हालाँकि, आप ये सोच रहें होंगे कि उपरोक्त परिस्थितियाँ “महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा,” जैसा कि विषयवस्तु ज्ञापित करता है, से किस प्रकार से नैरेटिव का अंग बनती हैं।  

चलिए आपकी यह दुविधा भी दूर किये देते हैं। मैं आपको यह बतलाने या धृष्टतापूर्वक यह समझाने की कोशिश करूँगा कि महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा व पितृसत्तात्मकता का सम्बन्ध कितना गहरा व पेचीदा है। मेरा इशारा उस तरफ भी है कि अत्याचारी की साइकोलॉजी क्या होती है; वह किन विचारों से प्रेरित हुआ होता हैं; समाज, संस्कृति व परवरिश के कौन-से मूल्य, जिनमे व पला-बढ़ा होता है, इसके प्रति सीधे तौर पर ज़िम्मेदार होतें हैं।

जेंडर की उठा-पटक से दूर मैं यह कहना चाहूँगा कि आज वो हर कोई असुरक्षित है जो किसी तरह से कमज़ोर और अकेला है; सत्ता प्रतिष्ठान से दूर है। ऐसे में बात जब महिलाओं की उठती है तो चाहें वो एक स्त्री हो या एक अबोध बच्ची, उनके ऊपर ख़तरा ज्यादा गंभीर है। अगर आज की कमो-बेस बदली व बदलती सामाजिक-आर्थिक ढाँचे को नज़रअंदाज़ करें जहाँ आज एक महिला भी अपना मकाम बड़े फक्र से हासिल कर रही हैं; वो चाहें ख़ुद का ऑफिस या स्वतंत्र रूप से करियर का चुनाव हो या राजनीति के अरबी घोड़े पर काबिज़ होने की बात, तो आज भी महिला कमजोरों की श्रेणी में निचले पायदान पर स्थूलमान हैं।

खैर, आपके संदेह को नकारते हुए मैं यह कहूंगा कि मैं पेसिमिस्टिक नहीं हूँ, ना ही पुरातनपंथी धड़े से सिम्पथी रखता हूँ। मौज़ूदा घटनाओं के मद्देनज़र अपने खिन्न मन के ग़ुस्से को स्वर देते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि महिलाओं के प्रति हिंसा एक बीमार मनोवस्था की देन है, एक ऐसा सिंड्रोम जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया था – त्रासजन्य आनंद।

बात अगर पहले मामले की करें तो धीमी-आँच से मेरा आशय उस हिंसा की ओर है जब महिलायें एक स्ट्रक्चरल हिंसा का शिकार होती हैं। यह हिंसा अक्सर महिला के किसी बेहद क़रीबी द्वारा रचा-बुना जाता है, मसलन पति। एक पढ़ा-लिखा, तथाकथित सुसभ्य, ऊँचे रुतबे का, सामाजिक पायदान में बेहद रसूख़दार पति शादी के वक़्त बड़े महीनता के साथ सर्वगुण संपन्न, सुन्दर, ज़हीन लड़की से शादी करता हैं। पर, बारीक़ी की पहचान वही तक सीमित रह जाती है; पत्नी अब  महज़ सुख-संभोग का एक उपकरण बन जाती है।

पति उस पर कभी हाथ नहीं उठता, विरले ही कभी चिल्लाता हैं और अगर चिल्लाता भी है तो महिला-विशेष के आस-पास ऐसे कई व्यक्ति होंगे जो पति के चिल्लाहट को इस और इशारा कर के जायज ठहरा देंगे कि वो तुम्हें मारता तो नहीं है न ? यह एक ख़ास रूप से योजनाबद्ध मानसिक हिंसा का परिचायक है जिसमे पति द्वारा पत्नी की वैचारिक-उपस्थिति और अस्तित्व को सिरे से ख़त्म करने की कवायद होती है।

आपकी सहूलियत को गौर-ए-नज़र रखते हुए इस नैरेटिव का एक सिरा लेख के दूसरे हिस्से में मिलेगा जिसमे मैं मामले के दोनों आयामों की सापेक्षिक सादृश्यता स्थापित करने की कोशिश करूँगा।

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