संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ भारत एक ऐसा देश हैं जहाँ प्रत्येक हज़ार में से 48 बच्चें पाँच साल की उम्र होने से पहले काल के गाल में समा जाते हैं। इसके प्रमुख कारणों में एक बात साफ़-साफ़ नज़र आती हैं और वो यह है कि सरकारी या लोक स्वास्थ्य केंद्रों की घोर अक्षमता और उसमे कार्य करने वाले मेडिकल पेशेवरों का गैर-ज़िम्मेदाराना रवैया तथा आम जनता के प्रति उनकी असंवेदनशीलता।

मामले की भयावहता की बानगी हमें तब देखने को मिलती हैं जब गोरखपुर जैसे हिंदुस्तान के एक छोटे से शहर में बेहतर इलाज की आस लिए आस-पास के गाँवों से अनगिनत ग़रीब सरकारी मेडिकल प्रतिष्ठानों की तरफ रुख़ करते हैं। क्योंकि, उनके गाँवों में प्राथमिक स्वास्थ्य की उपस्थिति नगण्य होती हैं और भूख तथा गर्मी की लू के बीच उन्हें जानलेवा वायरस से निःसहाय लड़ना पड़ता हैं जिसका अंजाम 386 मासूमों की जान ले लेती हैं।

जब ऐसे वाक़या मीडिया के हवाले से आपके आँखों से हो के गुज़रते हैं – आपकी अंतरात्मा को झँकझोर कर रख देते हैं। कुछ मूलभूत प्रश्न ज़ेहन में सहसा ही कौंध उठते हैं और मन बरबस ही यह पूछने को मजबूर होता है कि हम कहाँ पीछे रह गए, क्या सरकारी मशीनरी फेल हो गयी हैं। प्रश्नों का सिलसिला हमें यह भी सोचने को मजबूर करता है कि क्या व्यवस्था की अमानवीयता ने ख़ुद अपने ही देश की आम जनता के विश्वास को तोड़ दिया हैं ?

इन सभी बातों के मद्देनज़र यह बात भी ध्यान देने योग्य हैं कि स्वास्थ्यगत खर्चों में पब्लिक स्पेंडिंग यानि सरकार की तरफ से किये जाने वाले खर्च कुल स्वास्थ्यगत खर्च का तीस प्रतिशत ही होता है और आमजन खर्च का 70 प्रतिशत खुद अपने जेब से वहन करते हैं। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे आउट-ऑफ़-द-पॉकेट बोला जाता हैं।

इस सूरत-ए-हाल का नाजायज़ फ़ायदा गैर-सरकारी अस्पताल उठाते हैं और वे मरीजों से गैर-वाज़िब धन-उगाही करते हैं। प्राइवेट अस्पतालों का मनमानापन तब खुल के सामने आता है जब हम गुरुग्राम में एक नामी-गिरामी प्राइवेट हॉस्पिटल के द्वारा एक बीमार बच्ची को स्वस्थ करने की आड़ में उसके पिता से गैर-वाज़िब रूप से लाखों रुपयों की उगाही का जरिया बना लिया जाता हैं और बच्ची के स्वास्थ्य में सुधार आने के बजाय वो दम तोड़ जाती है।

हमें व्यवस्था से प्रश्न करना होगा और उसे जरुरी कानूनों को लागू करने के लिए मजबूर करना होगा ताकि हम आम नागरिक मजबूती से अपनी बातों को रख पाएँ और प्राइवेट हॉस्पिटल्स हमारे प्रश्नों का सही-सही जबाब देने के लिए उत्तरदायी हो। हमें सरकार से इस बात की भी मांग करनी होगी की सरकार आउट-ऑफ़-द-पॉकेट खर्च को काम करने के लिए जरुरी कदम उठायें ताकि आम जनों के ऊपर से महँगे मेडिकल ख़र्चे का बोझ काम हो। 

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